बच्चों को पर्यावरण, पितृसत्ता के बारे सीखने के लिए फिल्म बहुत अच्छा विकल्प है फिल्म शेरनी-Movie Review

Sherni movice

बेकार, बोरिंग, एंडिंग मज़ेदार नहीं थी, कोई गाना भी नहीं, धत-ऐसी कोई फ़िल्म होती है।

जी नहीं, मैं ऐसा नहीं कह रही। दुनियाँ जहान के लोग बोल रहे हैं। मैं तो यह बोल रही हूँ:

क्यूंकि कई लोगों को यह फिल्म बहुत धीमी गति वाली, और बिना कोई सन्देश दिए गए चली गई वाली लगी। कई लोग यह सोचते ही रह गए कि फिल्म का सन्देश क्या है?

आपको एक क़िस्सा सुनती हूँ। 2015 मैं दिल्ली के ललित कला अकेडमी में, मैंने Indian contemporary artist सबा हसन को असिस्ट किया था उनकी एक आर्ट एक्सिबिशन में। एक्सिबिशन के दौरान वहां एक साहब आये और उनकी आर्ट का एक नमूना देखकर वाह-वाह करने लगे। और दौड़ कर सबा जी के पास गए, और उनसे तपाक से पूछ बैठे “बहुत सुन्दर है काम है सबा जी, लेकिन यह जो आर्ट का मक़सद, सन्देश है वो है क्या मुझे तो समझ ही नहीं आरहा ” सबा जी ने शुक्रिया कहा और वापिस अपने काम में मुस्कुराते हुए लग गई। साहब समझ गए ख़िसक लिए। मैंने सबा जी से पूछा कि सबा जी आपने बेचारे को एक्सप्लेन क्यों नहीं किया।

उन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से जवाब दिया ”एक कलाकार क्या कहना चाहता है, उसका आर्ट वर्क क्या बोल रहा है यह, सबकी अपनी-अपनी समझ और इंटरप्रिटेशन की बात है, अगर कलाकार लोगो को एक्सप्लेन करने लगे तो वो कलाकार का काम नहीं है। न यह कलाकार की गरिमा बढ़ाता है।

तो दोस्तों, फिल्म भी बहुत संवेदनशील और ज़रूरी मुद्दों पर एक आर्ट फॉर्म-फिल्म के माध्यम से बात कर रही है। कलकारों ने अपना काम कर दिया है। इसमें छुपा हुआ संदेश क्या है वो एक दर्शक होने के नाते आपको समझना है, अपनी इंटरप्रिटेशन लगानी है।

असली मुद्दे समझने हैं, अच्छी फिल्में देखनी है तो अगर आज इस फ़िल्म को बेकार बोला गया तो “राधे” जैसी फिल्मों को कोसते हुए देखना पड़ेगा।

मेरी नज़र में फिल्म में बहुत बख़ूबी, रीयलिस्टिक होते हुए हर मुद्दे को दर्शा रही है।

क्यूंकि अगर फिल्म में विद्या बालन की जगह “अक्षय कुमार” होते तो शेर को तो कंधे पर उठा कर घूमते, उसके साथ नदी में स्विमिंग करते दिखते। और यह पुरुष अफ़सर उनको दो मुक्के इधर से दो मुक्के उधर से लगाते, इनकी मजाल थी कि ट्रांसफर करते।

लेकिन क्यूंकि यह फ़िल्म पूरी तरह से सच्ची-संजीदगी से दिखाई गई तो इसमें वही दिखाया गया जो शायद किसी भी महिला या ईमानदार ऑफिसर को इस दौरान देखना पड़ता-झेलना पड़ता।

हाँ हो सकता है कि फिल्म की रफ़्तार आपको थोड़ी धीमी लगे, लेकिन बहुत उम्दा और मैं दुबारा कह रही हूँ रीयलिस्टिक-वास्तविक होते इन मुद्दों को कवर किया है:

  • सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक मुद्दे
  • कार्यक्षेत्र में पितृसत्ता की जड़ें, लिंगभेद-पक्षपात
  • वन्य जीव और जीवन का संघर्ष


जितनी गहरी इन मुद्दों की जड़ें हैं हमारे समाज में, उतनी बार ही इन पर बात करने, इन्हे हाईलाइट करने की ज़रूरत है। शेरनी ने वो किया है

अगर आप अपने बच्चों में पर्यावरण, लिंग समानता जैसे मुद्दों के बारे में दिलचस्पी जगाना चाहते हैं, उन्हें इस बारे में कुछ सीखना चाहते हैं तो यह मौका मत जाने दीजिए। बच्चों के साथ यह फिल्म देखना बिलकुल बनता है।

फ़िल्म के एन्ड में विद्या बालन, विजय राज, नीरज काबी, बृजेंद्र कला जैसे मंझे हुए कलाकारों के लिए दिल से तारीफ़ निकलेगी।

कोई सवाल हैं? या किसी और फ़िल्म के बारे में मम्मी की राय जानना चाहते हैं तो नीचे कमेंट लिखिए।

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