मेरे बच्चें की माँ से मेरी पहली मुलाक़ात

मुझे आज भी याद है कि जब कभी किसी रिश्तेदार का नया बच्चा मेरी गोद में दे दिया जाता था तो मैं इतना घबरा जाती थी, मतलब बच्चा क्या रोएगा मैं बच्चे को देखकर इतना नर्वस हो जाती थी कि हाथ-पैर कापने लगते।

छोटे बच्चे अच्छे लगते थे लेकिन सिर्फ दूर से, पिक्चर्स में, असल जिंदगी में, मैं एक बच्चे को संभाल लूंगी। क्या मजाक कर रहे हो, नहीं कभी नहीं।

जब मुझे पता चला कि मैं प्रेग्नेंट हूं। वह भी कोविड-19 के जमाने में, तो मेरे मुंह से यही निकला था, नहीं मैं नहीं संभाल पाऊंगी इतना छोटा बच्चा, मैं कैसे? उस प्रेगनेंसी की खुशी तो दूर, मैं यह सोचकर बहुत नर्वस हो रही थी कि हम 2 लोगों के परिवार में, पूरा दिन, इतने छोटे बच्चे का ख्याल में अकेले कैसे रखूंगी! कहीं मैंने उसे गिरा दिया तो, उसको चोट लगा दी तो.. नहीं नहीं नहीं।

मैंने अपने साथी से कहा, चलो कुछ और सोचते हैं। सुनो हमें हमारे घर पर किसी को तो बुलाना पड़ेगा, मैं उसे दूर से देख लूंगी, और फिर जब वो थोड़ा बड़ा हो जाए, तो फिर शायद मैं उसे संभाल लूं।

मेरे साथी ने कहा, मैं हूं तुम्हारे साथ, तुम थोड़ी ना अकेले होगी। ठीक है जब वो समय आएगा, तब हम किसी ना किसी को अपने पास जरूर रख लेंगे।

धीरे-धीरे प्रेगनेंसी का वो फेज़ गुजरने लगा, आप यकीन मानेंगे, मैं आधे से ज्यादा समय यूट्यूब पर क्या देखती थी? मैं बस वह ब्लॉगस देखती रहती थी जिनमें नए जन्मे बच्चे को माँ घर पर संभाल रही हैं, मुझे बड़ी हैरानी होती थी देखकर कि विदेशों की ज्यादातर वीडियोस में जो कपल्स होते थे वो अपने बच्चे को हॉस्पिटल से सीधा अपने घर अकेले ही लेकर आते थे। मैं सोचती थी अरे वाह, पता नहीं कहां से ले आते हैं यह इतनी हिम्मत, कैसे कर लेते हैं!

फाइनली! वो दिन आ ही गया, जब मैंने एक बेटे को जन्म दिया। हॉस्पिटल में नर्स, परिवार वाले, सबके साथ मुझे पता ही नहीं चला कि 3 दिन कब गुजर गए। बहुत आराम से, मुझे कहाँ मेहनत करनी पड़ी।

अब बारी आई बच्चे को घर ले जाने की। मेरी बहुत ही प्यारी दोस्त और हम तीनों अपने घर आए, पहली बार, जीवनसाथी ही नहीं, इस बार माता-पिता बनकर। वो रात मुझे आज भी याद है, और शायद जिंदगी भर याद रहेगी, जब मैंने, और संजय ने अकेले अपने बच्चे का ख्याल रखा था। ना वो और ना हम दोनों पूरी रात सो ही नहीं पाए। बैबी की आंखे मुझे देखती तो मुझे लगता पूछ रही हों “तुम संभाल लोगी ना मुझे?” कभी उसकी आंखे कहती “तुम कर लोगी, मुझे तुम पर भरोसा है, तो रिलैक्स मेरी माँ।

लेकिन जब सुबह हुई, तो यह क्या हुआ, हम दोनों तो मानो प्रो हो चुके थे। पर मेरी तो बात ही क्या थी, मैं अपने पति को कैसे बेबी को ठीक से पकड़ना है, और वो कहां गलती कर रहा है पर ज्ञान बांटने लगी।

और मज़ा तो तब आया जब मेरे माता पिता हमें देखने घर आए। जब मेरी मां ने बैबी को गोद में लिया, उसने रोना शुरू कर दिया। मैंने झट से कहा, अरे ऐसे थोड़ी ना पकड़ते हैं, नहीं..नहीं भूख नहीं लगी है, देखो अभी चुप हो जाएगा। कभी सोचा था मैंने कि अपनी माँ को सिखाउंगी कि बच्चें को कैसे पकड़ना है।

सब का तो पता नहीं, लेकिन मैं अपने इस नए रूप पर बहुत प्राउड थी। वजह भी बड़ी ख़ास थी, क्यूंकि पहली बार मिल रही थी मैं अपने बच्चे की मां से।

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