घरों का काम करने वाली माँ-और कोरोना-House helps and Covid-19 in India

यह समय मुश्किल है समझ आता है लेकिन रिंकी जैसी सिंगल माँ और अच्छे फ्लैट्स में रहने वाली “दीदी” के मुश्किल टाइम में काफी अंतर है क्या इसमें कोई संदेह किया जा सकता है? शायद नहीं।

मेरे घर शाम 4 बजे काम करने आने वाली रिंकी ने जब 1 बजे दरवाज़ा बजाया तो मैंने पूछा कि इतनी जल्दी कैसे? उसने बताया फलाना और फलाना दीदी ने काम के लिए मना कर दिया है यह कह कर की तंगी चल रही है।

कभी कोरोना को सीरियस ना लेने वाली रिंकी इतनी डर चुकी है कि मास्क के बिना मैंने उसे कई हफ्तों से नहीं देखा, एक छोटी बॉटल में सेनिटिज़र भी रखने लगी है।

10 साल पहले उत्तरप्रदेश से भाग कर दिल्ली आने वाली रिंकी ने घरों में काम करना तब शुरू किया जब उसको भगा कर लाने वाला उसका प्रेमी जिससे उसने कभी भी औपचारिक रुप से शादी नहीं की थी, 1 बच्चों के जन्म के बाद रिंकी को छोड़ कर उसी के पड़ोस में किसी और नई औरत के साथ रहने लगा।

जब मैंने कहा वाह रिंकी यह हुई ना बात, तो वो बोली:

दीदी माँ हूँ, मुझे बहुत डर लगता है अब। अभी तो सब एक-एक करके मना कर रहे हैं कह रहे हैं कि 15 दिन बाद बुला लेंगे लिए, थोड़े दिन बाद बुला लेंगे लेकिन मुझे पता है अब तो कई महीने गुज़रने वाले हैं बिना काम के, पिछली बार भी तो यही हुआ था। पैसे तो हैं नहीं ख़ुद को ही बचा रही हूँ।

इस बीच मैं घंटो सोचती रही कि हम -लोग बहुत शान से पाखंड करते हुए कहते हैं, जी हम तो हमारे यहां जो काम करने वाली आती हैं उन्हें मेड नहीं कहते, बल्कि दीदी, और अंग्रेजी में आजकल बहुत ही प्रचलित शब्द हेल्प कह कर बुलाते हैं। हम तो बराबरी में यकीन करते हैं- और हमी लोग, उन्हें कभी भी अपने बगल में बैठने का दर्जा नहीं दे सकते, उनकी मासिक तनख्वाह में 200 ₹300 का फेरबदल करने से भी नहीं चूकते, उनके खाने-पीने, रोटी पर नज़र यहाँ तक की अपने बच्चों के सामने यह कहने से बाज नहीं आते ” पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो क्या दूसरों के घर में बर्तन, झाड़ू करोगे”? बराबरी तो दूर, मानवता की लाज भी नहीं रख पाते।

और आज जब मानवता की याद सबसे ज़्यादा आरही लोगों को तो रिंकी जैसी कई मायें आने वाले समय में बच्चों के लिए रोटी का जुगाड़ कैसे करेंगी सोच कर घुट रही हैं।

जब टेलीविजन पर आने वाली तबाही की खबरों को देखकर आप हाय हाय कर रहे हैं, ईश्वर आप पर दया करें- उस वक्त हमें सोचने की जरूरत है कि यही दया हमें हमारे घरों में काम करने वाली सभी रिंकीओं के साथ भी करनी है। जितना मुश्किल समय हमारे लिए है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल समय उनके लिए है।

तो उनको काम से बिना तन्खा दिए हटाना मानवता नहीं है। उनको काम पर आने से रोकना हमारा आपका चुनाव है, इससे उनके मासिक ख़र्च पर असर नहीं पड़ना चहिये यह सोचना हमारा कर्तव्य है।

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